Diwali ke baad ek din khali is saal diwali parv 6 din ka dhanteras nakara chaudas goverdhan puja and bhai dooj इस साल दिवाली के बाद 1 दिन खाली, 6 दिन का दिवाली पर्व, जानें धनतेरस, नरक चतुर्दशी, गोवर्धन पूजा, भाई दूज की तारीख, एस्ट्रोलॉजी न्यूज़


संक्षेप: दीपावली भले एक दिन मनाई जाती है लेकिन यह पर्व पांच दिनों का होता है। यानी धनत्रयोदशी से शुरू होकर यम द्वितीया तक। शास्त्रों में इन पांच दिनों को यम पंचक कहा गया है। इन पांच दिनों में यमराज, वैद्यराज धनवंतरि, लक्ष्मी-गणेश, हनुमान, काली और भगवान चित्रगुप्त की पूजा का विशेष विधान है। 

दीपावली भले एक दिन मनाई जाती है लेकिन यह पर्व पांच दिनों का होता है। यानी धनत्रयोदशी से शुरू होकर यम द्वितीया तक। शास्त्रों में इन पांच दिनों को यम पंचक कहा गया है। इन पांच दिनों में यमराज, वैद्यराज धनवंतरि, लक्ष्मी-गणेश, हनुमान, काली और भगवान चित्रगुप्त की पूजा का विशेष विधान है। धनत्रयोदशी और अमावस्या की तिथि 25 घंटे से अधिक अवधि तक रहने से पंच दिवसीय दीपपर्व लगातार तीसरे साल छह दिनों में पूरा होगा।

नरक चतुर्दशी

नरक चतुर्दशी को नरका चौदस और हनुमान जयंती के रूप में भी प्रतिष्ठा है। शास्त्रीय मान्यताओं के अनुसार इस दिन शाम को चार बत्तियों वाला पुराना दीपक घर के बाहर कूड़े के ढेर पर जलाना चाहिए। इसके पीछे मान्यता है कि स्थान चाहे कोई भी हो शुभता का वास हर जगह है। सुबह सरसों का तेल और उबटन लगाकर स्नान करना चाहिए। यमराज के निमित्त तर्पण जरूर करें। माख के पत्ते पर शुद्ध सात्विक भोजन करना चाहिए। सूर्यास्त से अगले दिन सूर्योदय के मध्य हनुमान दर्शन की महत्ता है। हनुमानजी का जन्म कार्तिक कृष्ण चतुर्दशी की शाम को मेष लग्न में हुआ था।

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धनतेरस

इसे धनतेरस भी कहते हैं। इस दिन का मुख्य संबंध यमराज की आराधना से है। आयुर्वेद के प्रवर्तक धनवंतरि की जयंती भी इसी दिन होती है। एक तरफ वैद्य (चिकित्सक) समाज धनवंतरि का पूजन कर सबके स्वास्थ की कामना करता है तो दूसरी ओर गृहस्थ यम दीप जलाकर यमराज से अकालमृत्यु टालने की प्रार्थना करते हैं। महावीर पंचांग के संपादक पं.रामेश्वरनाथ ओझा के अनुसार शाम को यमराज के निमित्त दीप जला कर घर के दरवाजे के बाहर रखना चाहिए। इस दिन देवी लक्ष्मी की आराधना की परंपरा भी है। लोक मान्यताओं के अनुसार इस दिन स्वर्ण या रजत मुद्राएं अथवा बर्तन खरीदना शुभ माना जाता है।

दीपावली सनातनी परंपरा में रात में मनाए जाने वाले प्रमुख पर्वों में है। तीसरी महानिशा कालरात्रि का पर्व जनसामान्य में दीपावली के नाम से प्रतिष्ठित है। दीपावली के दिन सूर्यास्त से अगले दिन सूर्योदय के बीच का काल विशेष रूप से प्रभावी है। कालरात्रि वह निशा है जिसमें तंत्र साधकों के लिए सर्वाधिक अवसर होते हैं। कालरात्रि में औघड़ पंथ के साधक जनकल्याण के लिए विशिष्ट सिद्धियां अर्जित करने के लिए महाश्मशान पर अनुष्ठान करते हैं। वहीं घर-घर में श्रीगणेश-माता लक्ष्मी की पूजा की जाती है। 21 अक्तूबर को भी अमावस्या की तिथि रहेगी।

अन्नकूट एवं गोवर्धन पूजा : 22 अक्तूबर

कार्तिक शुक्ल प्रतिपदा प्रारंभ : 21 अक्तूबर शाम 4:26 बजे

कार्तिक शुक्ल प्रतिपदा समापन :22 अक्तूबर शाम 6:18 बजे

(उदयातिथि में प्रतिपदा 22 अक्तूबर को होने से इसका मान उसी दिन होगा)

गोवर्धन पूजा का मुहूर्त

22 अक्तूबर: सुबह 6:43 बजे से 8:52 बजे तक

कुल अवधि : 2 घंटे 9 मिनट

भाई दूज : 23 अक्तूबर

कार्तिक मास द्वितीया तिथि प्रारंभ: 22 अक्तूबर रात 6:18 बजे

कार्तिक मास की द्वितीया तिथि समापन : 23 अक्तूबर रात 8:23 बजे

टीका का मुहूर्त : 23 अक्तूबर सुबह 6:22 बजे से रात 8:23 बजे तक

धनतेरस : 18 अक्तूबर

त्रयोदशी तिथि आरंभ : 18 अक्तूबर दिन में 12:19 बजे

त्रयोदशी तिथि समापन : 19 अक्तूबर दिन में 01:51 बजे तक

अभिजित मुहूर्त : दिन में 12: 01 बजे से 12: 48 बजे तक

चौघड़िया मुहूर्त: दिन में 1:51 बजे से दिन में 3: 18 बजे तक

प्रदोष काल: शाम 6:11 बजे से रात 8: 41 बजे तक



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