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राजस्थान के नगर निकाय चुनाव के नतीजे भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) के पक्ष में आए हैं. बीजेपी कांग्रेस से आगे है और राज्य के ज़्यादातर निकायों में उसका प्रदर्शन कांग्रेस से बेहतर रहा है.
लेकिन इन नतीजों की कहानी सिर्फ़ बीजेपी की जीत तक सीमित नहीं है. राज्य में करीब ढाई साल से बीजेपी की सरकार है. राज्य के मुख्यमंत्री ने नगर निगम इलाकों में रोड शो किए थे.
राज्य निर्वाचन आयोग के आंकड़ों के अनुसार, 309 शहरी निकायों के 10,244 वार्ड के परिणाम 14 सितंबर को घोषित किए गए हैं.
बीजेपी ने 4,179 वार्ड जीते, जबकि कांग्रेस के खाते में 3,613 वार्ड आए. निर्दलीय उम्मीदवारों ने 2,273 वार्डों में जीत दर्ज की है.
यानी सत्ता में बैठी बीजेपी, कांग्रेस से थोड़ी ही आगे रही. यही आंकड़ा इन चुनावों को दिलचस्प बनाता है.
और सवाल खड़े करता है कि क्या बीजेपी की यह जीत 2028 के विधानसभा चुनाव के लिए मज़बूत आधार का संकेत है या फिर कांग्रेस की वापसी की शुरुआती आहट?
क्या हैं निकाय चुनाव परिणाम के बीजेपी और कांग्रेस के लिए मायने?
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने राजस्थान के निकाय चुनाव में बीजेपी की जीत पर जनता का आभार जताया है. उन्होंने इसे डबल इंजन सरकार की सुशासन और विकास नीतियों को जनता का समर्थन बताया है.
बीजेपी प्रदेश अध्यक्ष मदन राठौड़ ने निकाय परिणाम को पार्टी के लिए ऐतिहासिक बताया है.
14 सितंबर को उनकी ओर से जारी प्रेस नोट में कहा गया है कि, “पिछले चुनाव की तुलना में इस बार बीजेपी ने लगभग ढाई से तीन गुना बेहतर प्रदर्शन किया है. चाहे नगर निगम हों, नगर परिषद हों या नगर पालिकाएं, सभी नगरीय निकायों में पार्टी को जनता का व्यापक समर्थन और आशीर्वाद मिला है.”
इधर, राजस्थान विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष टीकाराम जूली ने कहा, “जिन शहरी क्षेत्रों को भारतीय जनता पार्टी अपना अभेद्य गढ़ कहती रही है, इन नतीजों ने उसी गढ़ की दीवारों में गहरी दरारें डाल दी हैं.”
टीकाराम जूली ने कहा कि सत्तापक्ष को इन परिणामों का उत्सव मनाने के बजाय जनादेश को समझना चाहिए.
बीजेपी आगे, लेकिन बड़े नेताओं के गढ़ में मिले झटके
शहरी निकायों को राजस्थान में बीजेपी का मजबूत आधार माना जाता है. ऐसे में चुनाव पर नज़र रखने वाले लोग इसे बीजेपी के लिए अजूबा नहीं बताते हैं.
लेकिन कई बड़े शहरों और बीजेपी के दिग्गज नेताओं के इलाकों के परिणाम पार्टी के लिए चिंता का कारण ज़रूर हैं.
जोधपुर में बीजेपी और कांग्रेस के बीच मुक़ाबला लगभग बराबरी का रहा. जोधपुर से लगातार तीन बार सांसद रहे केंद्रीय मंत्री गजेंद्र सिंह शेखावत के अपने वॉर्ड में बीजेपी की हार हुई.
बीकानेर में केंद्रीय मंत्री और बीजेपी के वरिष्ठ नेता अर्जुन राम मेघवाल के क्षेत्र में कांग्रेस बहुमत हासिल करने में कामयाब रही.
अलवर में केंद्रीय मंत्री भूपेंद्र यादव के क्षेत्र में बीजेपी और कांग्रेस लगभग बराबरी पर हैं. यहां निर्दलीय पार्षद यह तय करेंगे कि बोर्ड किसका बनेगा.
अजमेर में कांग्रेस ने 36 साल बाद बोर्ड बनाने की स्थिति हासिल की है. अजमेर से केंद्रीय मंत्री भागीरथ चौधरी और राजस्थान विधानसभा अध्यक्ष वासुदेव देवनानी आते हैं. ऐसे में यहां कांग्रेस की बढ़त बीजेपी के लिए राजनीतिक तौर पर अहम है.
मुख्यमंत्री भजनलाल शर्मा के गृह ज़िले भरतपुर में बीजेपी को सिर्फ़ 20 सीटें मिली हैं. जबकि 38 निर्दलीय उम्मीदवारों ने जीत दर्ज की है.
यानी बोर्ड बनाने में निर्दलीय जीतने वालों की भूमिका निर्णायक होगी.
बीजेपी प्रदेश अध्यक्ष मदन राठौड़ के गृह ज़िले पाली में भी पार्टी को हार का सामना करना पड़ा है. जबकि, पूर्व मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे के प्रभाव वाले झालावाड़ में कांग्रेस ने जीत दर्ज की है.
कोटा में बीजेपी की जीत हुई है. लेकिन स्थानीय राजनीति में कांग्रेस नेताओं के बीच अंदरूनी खींचतान को इसकी एक बड़ी वजह माना जा रहा है.
कांग्रेस के लिए वापसी का संकेत या सिर्फ़ राहत?

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कांग्रेस के लिए इन चुनावों को जीत कहना मुश्किल है, लेकिन पार्टी के लिए इनमें राहत और उम्मीद के कई संकेत जरूर हैं.
सबसे बड़ा संकेत वोट शेयर का है, बीजेपी 36.11 फ़ीसदी वोट के साथ कांग्रेस से सिर्फ़ 0.97 फ़ीसदी आगे है.
अजमेर में 36 साल बाद कांग्रेस का बोर्ड बनने की स्थिति में आना इसका सबसे बड़ा उदाहरण है.
जयपुर में भी तस्वीर कांग्रेस के लिए पूरी तरह ख़राब नहीं है.
राजधानी में बीजेपी बोर्ड बनाने की स्थिति में है. लेकिन कांग्रेस और बीजेपी के बीच कुल वोटों का अंतर करीब 14 हज़ार है. यहां सबसे बड़े अंतर से जीतने वाले उम्मीदवारों में कांग्रेस प्रत्याशी भी शामिल है.
दूसरी ओर, कांग्रेस के लिए इन चुनावों में कई चेतावनियां भी हैं.
पूर्व मुख्यमंत्री अशोक गहलोत के अपने वार्ड में कांग्रेस की हार हुई है. कई जगहों पर पार्टी के नेताओं के बीच आपसी खींचतान और संगठनात्मक कमजोरी चुनाव प्रचार में भी दिखाई दी.
कांग्रेस प्रदेशाध्यक्ष गोविंद सिंह डोटासरा ने इन नतीजों को बीजेपी सरकार के लिए आईना बताया है.
उन्होंने कहा, “निकाय चुनाव में शहरी गढ़ में बीजेपी की बढ़त एक फ़ीसदी से भी कम रही है और जनता ने ढाई साल के कुशासन का जवाब दिया है.”
उन्होंने कहा कि ये नतीजे 2028 के विधानसभा चुनाव से पहले बड़ा संकेत है और अब पंचायत चुनाव में भी बीजेपी की पोल खुलेगी.
राजस्थान विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष टीकाराम जूली ने निकाय चुनाव परिणाम को लेकर भाजपा को घेरा है.
उन्होंने कहा, “राजस्थान के इतिहास में पहली बार निकाय चुनावों में मुख्यमंत्री को खुद रोड शो और रैलियां करनी पड़ीं हैं. बड़े-बड़े नेताओं को महाराष्ट्र तक से बुलाना पड़ा और पूरी सरकारी मशीनरी झोंक दी गई. इसके बावजूद जनता ने बीजेपी को कड़ा संदेश दिया है.”
उन्होंने कहा है, “करीब तीन साल के शासन में प्रदेश की जनता ने यह स्पष्ट कर दिया है कि केवल सत्ता, प्रचार और सरकारी मशीनरी के भरोसे जनसमर्थन कायम नहीं रह सकता. जनता अब काम, जवाबदेही और अपने शहरों की बदहाल व्यवस्थाओं का हिसाब मांग रही है.”
सत्ता में रहते बीजेपी का 41% वॉर्ड जीतना क्या बताता है?

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इन चुनावों का एक और पहलू है, जिसे बीजेपी की जीत के उलट नजरिए से देखा जा रहा है.
कुल 10,244 वार्डों में बीजेपी ने 4,179 वार्ड जीते हैं. यानी करीब 41 फ़ीसदी वॉर्ड बीजेपी के खाते में गए हैं.
वरिष्ठ पत्रकार योगेश शर्मा बीबीसी न्यूज़ हिन्दी से कहते हैं, “सत्ता में रहते हुए बीजेपी के लिए यह सवाल ज़रूर उठता है कि अगर शहरी निकाय चुनाव में कांग्रेस उन्हें इतनी करीबी टक्कर दे सकती है तो ग्रामीण राजस्थान में क्या तस्वीर होगी?”
योगेश शर्मा इस बात पर ज़ोर देते हैं कि यह इस मायने में ख़ास है कि निकाय चुनाव से पहले परिसीमन भी हुआ था.
वो कहते हैं, “बीजेपी ने अपनी राजनीतिक सुविधा के हिसाब से परिसीमन का लाभ लेने की कोशिश की थी. ऐसे में पार्टी के लिए यह परिणाम सोचने का विषय हो सकता है.”
उनका मानना है कि अगर परिसीमन नहीं हुआ होता तो बीजेपी के लिए नतीजे और अधिक चुनौतीपूर्ण हो सकते थे.
इधर, कुचामन-डीडवाना ज़िले के परबतसर नगरपालिका के वॉर्ड 13 से भाजपा प्रत्याशी कैलाशचंद को सिर्फ़ एक वोट मिला है.
कैलाशचंद ने समाचार एजेंसी पीटीआई से कहा था कि वह वार्ड 12 के मतदाता थे. लेकिन, पार्टी ने उन्हें नज़दीकी वार्ड 13 से प्रत्याशी बनाया था. इसलिए वह ख़ुद भी अपना वोट ख़ुद के पक्ष में नहीं डाल सके.
परबतसर नगरपालिका में 25 वार्ड हैं, यहां से कांग्रेस ने 13 वार्ड जीत कर बहुमत हासिल किया है.
निर्दलीय और छोटे दलों ने भी दोनों पार्टियों की चिंता बढ़ाई
इन चुनावों में बीजेपी और कांग्रेस के अलावा निर्दलीय और छोटे दलों का प्रदर्शन भी अहम रहा है.
2,273 वार्डों में निर्दलीय उम्मीदवारों की जीत हुई है. करीब 30 निकायों में निर्दलीयों के समर्थन के बिना बोर्ड बनना मुश्किल है.
मुख्यमंत्री भजन लाल शर्मा का गृह ज़िला भरतपुर इसका बड़ा उदाहरण है. जहां बीजेपी को 20 सीटें मिली हैं और 38 निर्दलीय जीते हैं.
इन निर्दलीयों की भूमिका सिर्फ़ स्थानीय बोर्ड बनाने तक सीमित नहीं है.
यह इस बात का भी संकेत है कि कई जगह मतदाताओं ने बीजेपी और कांग्रेस के उम्मीदवारों के बजाय स्थानीय उम्मीदवारों को चुना है.
इसके अलावा राष्ट्रीय लोकतांत्रिक पार्टी (आरएलपी) को 63, आम आदमी पार्टी को 42 और सीपीआई(एम) को 38 वार्डों में जीत मिली है.
बारां में आम आदमी पार्टी का प्रदर्शन ख़ासतौर पर महत्वपूर्ण है. वहीं बीकानेर के नोखा में सीपीआई(एम) को बहुमत मिला है.
राजस्थान की परंपरागत राजनीति में बीजेपी और कांग्रेस के बीच सीधी लड़ाई रही है. ऐसे में इन जगहों पर तीसरे राजनीतिक विकल्प का उभरना दोनों प्रमुख दलों के लिए चिंता का कारण बन सकता है.
हालांकि, स्थानीय निकायों में मिली सफलता को पूरे राज्य में तीसरे विकल्प की मजबूत मौजूदगी मानना अभी जल्दबाज़ी होगी.
इन चुनावों के बाद अब पंचायत चुनाव के लिए भी आरक्षण/लॉटरी की तारीखें तय कर दी गई हैं.
सरकार की ओर से पहले 15 सितंबर को चुनाव को स्थगित करने का आदेश जारी हुआ था. इस आदेश के बाद कांग्रेस ने आरोप लगाया था कि सरकार ने निकाय परिणाम के बाद घबराहट के कारण ये क़दम उठाया.
अब सरकार ने 16 सितंबर को लॉटरी की तारीखों की घोषणा की है. पंचायतों में चुनाव के लिए आरक्षण के मुताबिक लॉटरी निकली जाएगी.
बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित.
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