महाराष्ट्र के अधिकारियों के लिए अब हिंदी की परीक्षा जरूरी नहीं, राज ठाकरे के विरोध के बाद फैसला


महाराष्ट्र के मराठी भाषा मंत्री उदय सामंत ने कहा है कि राजपत्रित और गैर-राजपत्रित अधिकारियों के लिए हिंदी भाषा परीक्षा आयोजित करने के राज्य सरकार के निर्णय पर रोक लगा दी गई है. यह कदम महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना (मनसे) के विरोध के बीच उठाया गया है.

उदय सामंत ने कहा, “मैंने प्रधान सचिव (मराठी भाषा विभाग) किरण कुलकर्णी से बात की. परीक्षा पर रोक लगा दी गई है.” उन्होंने कहा कि वह इस बात का पता लगाएंगे कि परीक्षा की वास्तव में आवश्यकता है या नहीं. मराठी भाषा मंत्री उदय सामंत ने कहा, “भविष्य में, यदि हमें लगता है कि परीक्षा अनावश्यक है, तो हम इसे आयोजित नहीं करने का निर्णय लेंगे.”

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‘हिंदी थोप रही है सरकार’- मनसे नेता

दूसरी ओर, मनसे की मुंबई इकाई के प्रमुख संदीप देशपांडे ने कहा कि उनकी पार्टी सरकार द्वारा हिंदी थोपने के निर्णय की निंदा करती है. देशपांडे ने चेतावनी दी कि परीक्षा केंद्रों के बाहर होने वाली गड़बड़ी के लिए राज्य सरकार जिम्मेदार होगी.

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‘केवल मराठी भाषा को मिले सबसे ज्यादा महत्व’

राज ठाकरे की मनसे का कहना है कि महाराष्ट्र में सबसे ज्यादा महत्व केवल एक भाषा को मिलना चाहिए और वह है मराठी. पार्टी की ओर से चेतावनी दी गई थी कि अगर यह हिंदी परीक्षा आयोजित होती है तो राज ठाकरे के कार्यकर्ता कड़ा विरोध प्रदर्शन करेंगे. इसके चलते राज्य में जो भी परिस्थिति बनेगी, उसकी जिम्मेदारी महाराष्ट्र सरकार की होगी. विवाद बढ़ता देख सरकार ने हिंदी परीक्षा पर रोक लगाने का निर्णय लिया है. 

क्या था हिंदी भाषा परीक्षा नियम?

जानकारी के लिए बता दें कि महाराष्ट्र नागरिक सेवा (हिंदी भाषा परीक्षा) नियम, 1976 के मुताबिक, राज्य सरकार के हर राजपत्रित और गैर-राजपत्रित कर्मी के लिए हिंदी का ज्ञान अनिवार्य था. जिन्होंने 10वीं में हिंदी नहीं पढ़ी थी, उन्हें सरकारी सेवा में आने के बाद एक समय सीमा के अंदर हिंदी की परीक्षा पास करनी होती थी. अगर यह एग्जाम क्लियर नहीं हुआ तो वेतन और प्रमोशन रोका जा सकता था.



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